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Undekhi The Final Battle Review: दमदार किरदार लेकिन ढीली कहानी, जानिए कैसा है आखिरी सीजन

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Sony LIV की वेब सीरीज ‘अनदेखी: द फाइनल बैटल’ का पूरा रिव्यू पढ़ें। जानिए एक्टिंग, कहानी, निर्देशन और क्या यह सीजन देखने लायक है।

ओटीटी प्लेटफॉर्म Sony LIV पर रिलीज हुई वेब सीरीज Undekhi The Final Battle एक बार फिर उसी अंधेरी दुनिया में लेकर जाती है, जहां ताकत का मतलब कानून से ऊपर होना है। जब इस सीरीज का पहला सीजन आया था, तब इसने अपने कच्चे और बेबाक अंदाज से दर्शकों को चौंका दिया था। कहानी सीधी थी, लेकिन असरदार थी—एक ऐसा सिस्टम जहां अपराध करना आसान और बच निकलना उससे भी आसान। अब ‘द फाइनल बैटल’ के साथ यह सफर अपने आखिरी पड़ाव पर पहुंचता है, लेकिन सवाल यही है कि क्या यह अंत उतना ही प्रभावशाली है जितनी इसकी शुरुआत थी?

सीरीज इस बार समय में आगे बढ़ती है और शुरुआत से ही कई मोर्चों पर एक साथ कहानी को आगे बढ़ाने की कोशिश करती है। अतवाल परिवार के भीतर की जंग, नए बिजनेस, बाहरी दुश्मन और मानव तस्करी जैसे गंभीर ट्रैक एक साथ सामने आते हैं। लेकिन यही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन जाती है। कहानी एक दिशा में चलने के बजाय कई हिस्सों में बंटती चली जाती है, जिससे उसका प्रभाव कमजोर पड़ता है। हर एपिसोड में कुछ बड़ा जरूर होता है, लेकिन वह एक मजबूत और यादगार कहानी का रूप नहीं ले पाता।

किरदारों की बात करें तो हर्ष छाया का ‘पापाजी’ अब भी सीरीज की पहचान बना हुआ है, लेकिन इस बार उनका अंदाज दोहराव का शिकार लगता है। वही गुस्सा, वही दबदबा, लेकिन उसमें पहले जैसा नया डर या ताजगी महसूस नहीं होती। कई जगह उनका किरदार ओवरपावरिंग लगने के बजाय थका हुआ सा नजर आता है।

वहीं दिब्येंदु भट्टाचार्य का किरदार, जो पहले कहानी का मजबूत स्तंभ था, इस बार पीछे छूटता दिखता है। उनकी मौजूदगी तो है, लेकिन प्रभाव पहले जैसा नहीं रह गया। इसके उलट सूरज शर्मा का ‘रिंकू’ इस सीजन की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरता है। उनका शांत, सोचा-समझा और नियंत्रित अभिनय सीरीज को संभालने का काम करता है। जब भी कहानी भटकती है, रिंकू का ट्रैक उसे फिर से जमीन पर लाने की कोशिश करता है।

नए किरदारों की एंट्री से कहानी को विस्तार देने की कोशिश की गई है। गौतम रोडे, शिवज्योति राजपूत और साकिब अयूब जैसे कलाकार अपने-अपने रोल में नजर आते हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी कहानी को सुलझाने से ज्यादा उलझाती है। कई बार ऐसा लगता है कि किरदार सिर्फ कहानी को बड़ा दिखाने के लिए जोड़े गए हैं, न कि उसे मजबूत बनाने के लिए।

निर्देशन की बात करें तो आशीष आर शुक्ला ने इस बार सीरीज का स्केल जरूर बढ़ाया है। लोकेशंस, सिनेमैटोग्राफी और प्रोडक्शन वैल्यू पहले से बेहतर नजर आती है। कई सीन ऐसे हैं जो अलग से देखने पर प्रभावशाली लगते हैं, लेकिन पूरी कहानी में जुड़ने पर उनका असर कम हो जाता है। कुछ एपिसोड में गति इतनी धीमी हो जाती है कि लगता है कहानी रुक गई है और किरदार सिर्फ स्क्रीन भरने के लिए मौजूद हैं।

सीरीज का डार्क टोन अब भी बरकरार है, जो इसकी सबसे बड़ी पहचान रही है। हिंसा, सत्ता का खेल और नैतिकता की कमी—ये सभी तत्व यहां भी मौजूद हैं। हालांकि, इस बार हिंसा का असर पहले जैसा नहीं रह गया। बार-बार होने वाली घटनाएं दर्शकों को चौंकाने के बजाय एक समय के बाद सामान्य लगने लगती हैं, जिससे भावनात्मक जुड़ाव कमजोर पड़ता है।

‘अनदेखी’ की सबसे बड़ी ताकत हमेशा इसकी टाइट और फोकस्ड कहानी रही है। लेकिन ‘द फाइनल बैटल’ में यही चीज सबसे ज्यादा कमजोर दिखती है। बहुत सारे सबप्लॉट और किरदार जोड़ने के चक्कर में कहानी अपना केंद्र खो देती है। नतीजा यह होता है कि दर्शक यह तय नहीं कर पाता कि उसे किस हिस्से से जुड़ना चाहिए।

फिर भी, सीरीज पूरी तरह निराश नहीं करती। कुछ सीन ऐसे हैं जो पुराने सीजन की याद दिलाते हैं और थोड़ी देर के लिए वही पुराना रोमांच वापस ले आते हैं। खासकर रिंकू का किरदार इस सीजन को देखने लायक बनाए रखता है।

देखें या नहीं?

अगर आपने ‘अनदेखी’ के पिछले सीजन देखे हैं, तो यह सीजन आप मिस नहीं करना चाहेंगे। यह जानने की उत्सुकता बनी रहती है कि कहानी का अंत कैसे होता है। लेकिन अगर आप एक टाइट, थ्रिल से भरपूर और हर एपिसोड में पकड़ बनाए रखने वाली कहानी की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह सीजन आपको थोड़ा निराश कर सकता है।

सीधी बात करें तो ‘अनदेखी: द फाइनल बैटल’ एक ऐसा सीजन है जो अपने किरदारों के दम पर चलता है, लेकिन कहानी के स्तर पर उतना मजबूत नहीं बन पाता। यह खराब नहीं है, लेकिन उतना असरदार भी नहीं जितना इसे होना चाहिए था।

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